Thursday, September 21, 2017

कौन है 'वो'


  

1. 

आज उसने अपना दर्द 
रोटी पर लगाया 
और चटकारे ले-ले कर खाया,
गुस्से को चबा-चबा कर हज़म कर गयी,
भूख इतनी थी कि निगल गयी अपना अस्तित्व चुपचाप,
अब बंद पड़ी है बोतल के अन्दर;
जब कोई ढक्कन खोलेगा;
समझ जाएगा उसके होने के मायने।

२.
चौखट पर बिखरी है धूप बन.... 
घर को रौशन करने को आतुर,
ओस बन छुआ है तुम्हारे तलवों को 
दूब की हरियाली बन...... 
जड़ जमाई है तुम्हारे मन में,
बूँद बन छुपी है..... 
तुम्हारी पलकों के नीचे;
अरे- अरे हौले से छूना!
कंही दरक न जाये उसका स्वाभिमान;
मर्यादा है तुम्हारे घर की,
सदियों से यही तो कहते आये हो न! 

3.
सात पर्दों में,
दरवाजों के अन्दर 
चुन्नियों और नकाबों में,
कंहा -कंहा छुपाया है;
फिर भी निकल आती है,
खुशबू बन बिखर जाती है.
नीम के बीज सी,
कभी कड़वी कभी मीठी;
आवाज़ है वो!
लोरी बन सुला सकती है
तो बहरा भी कर सकती है
बस पंगा मत लेना! 




(Picture credit google)

10 comments:

  1. प्रिय अपर्णा ----- नारी के स्वाभिमानी रूप को बड़ी ही गहराई से परिभाषित करती आपकी ये रचना पढ़कर बहत अच्छा लग रहा है | और अंतिम पंक्तियों में तो पूरा सार मौजूद है |--------
    लोरी बन सुला सकती है
    तो बहरा भी कर सकती है
    बस पंगा मत लेना!

    सचमुच यही है नारी !!!!!!! उसे सम्मान दो , प्यार दो तो वह करुणा से भरी है , ममता और स्नेह से भरी है -- पर यदि उसके स्वाभिमान को ललकारा जाये तो वह ममतामयी मानवी से शक्तिरूपा दुर्गा या काली भी बन सकती है | शक्ति उपासना के नौ दिन के शुभारम्भ पर ये रचना सच्चे नारी विमर्श से भरी है | आपको बहुत बधाई और सस्नेह शुभकामना के साथ नवरात्रों की मंगल कामनाएं मिले |

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    1. आदरणीय रेनू दी, मै शक्ति स्वरूपा मां के विविध रूपों को ही दिखाना चाह रही थी लेकिन उसे धर्म विशेश से सम्बद्ध किये बिना. आपकी व्याख्या ने कविता के मर्म को बडी कुशलता से चित्रित किया है.आपकी इतनी आत्मीय ने मन विभोर कर दिया.आप सब के आशीष की आकांक्षा के साथ सादर आभार.

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  2. आज उसने अपना दर्द


    रोटी पर लगाया


    और चटकारे ले-ले कर खाया,


    Very beautiful lines..Congratulation

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  3. बहुत ही लाज़वाब रचना अपर्णा जी,
    नारी के सम्मान और अस्तित्व के लिए आपकी लेखनी का ओज प्रखर प्रकाश बन फैल रहा है।
    आपकी तीसरी रचना मुझे बहुत बहुत पसंद आयी।
    माता रानी आपके लेखनी को और समृद्ध करें।
    मेरी बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ है आपको।

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  4. अपने अस्तित्व और अपने दर्द को लील लेना आसान नहीं होता ... तीनों क्षणिकाएं बहुत ही गहरी ...

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  5. नासवा जी, तीनो कविताओं के मर्म तक पंहुच कर उनकी गहराई की प्रशंशा करने के लिये बहुत बहुत आभार. आप सब की प्रतिक्रियायें ही मेरा सम्बल हैं. सादर धन्यवाद

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