आख़िरी इच्छा (लघुकथा)
दादा ने सुबह खटिया से उठते ही दादी से कहा, "कुछ मजेदार बनाओ आज ,खाकर दिल खुश हो जाए, बहुत दिन से उबला हुआ खाना खा कर लग रहा है जबान से स्वाद ही गायब हो गया है"। दादी ने दादा को घूर कर देखा, मानो कच्चा निगल जायेंगी। दादा ने नज़रें दूसरी तरफ़ फ़ेर लीं। उनकी इतनी हिम्मत कि दादी की नजरों का सामना कर सकें! "बुढ़ापे में चटोरी ज़बान पर काबू नहीं है। तेल मसाला खाते ही पाखाना दौड़ने लगते हैं, नारा बांधने की भी सुध नहीं रहती और खाएंगे मजेदार, स्वादिष्ट" बड़बड़ाते हुए दादी रसोई के डिब्बे खंगालने लगी। दादा घंटा भर से इंतज़ार कर रहे हैं कि अब बुलावा आए खाने का, लेकिन कहीं कोइ सुगबुगाहट नजर नहीँ आ रही। तब तक दादी थाली लेकर आती हुई दिखीं और धीरे से कमरे में जाकर दादा को इशारे से बुलाया। थाली देखकर दादा की आंखें चमकने लगी। पूरी, खीर, गोभी आलू मटर की सब्जी,बैंगन भाजा रसगुल्ला। दादी ने कहा ," पहले कमरा बंद करो, कोई देख न ले। फिर चुपचाप खा लो, और खबरदार जो थाली में एक निवाला भी छोड़ा।" दादा की नज़र थाली से नहीं हट रही, याद नहीं आ रहा कब ऐसे भोजन के दर्शन हुए थे। दादी ...

नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 19-10-2017 को प्रातः 4 :00 बजे प्रकाशनार्थ 825 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।
जवाब देंहटाएंबहुत आभार आपका आदरणीय.
जवाब देंहटाएंसादरl`}
बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंशुभ दीपावली!
शुक्रिया कविता जी.
हटाएंआपको भी दीपावली की शुभकामनायें.
सुंदर रचना । आपको एवं आपके पूरे परिवार को दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
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