झूठे बाज़ार में औरत
एक पूरा युग अपने भीतर जी रही है स्त्री, कहती है ख़ुद को नासमझ, उगाह नहीं पायी अब तक अपनी अस्मिता का मूल्य, मीडिया की बनाई छवि में घुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री, सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ में असली भेड़ियों को पहचान लेती है स्त्री चुप है, कि उसके नाम पर उगाहे जा रहे हैं प्रशस्ति पत्र, रुपयों की गठरियाँ सरकाई जा रही हैं गोदामों में, स्त्री विमर्श के नाम पर झूठ के पुलिंदों का अम्बार लग रहा है, लोग खुश हैं! कि रची जा रही है स्त्री की नई तस्वीर, खोजती हूँ कि इस तस्वीर से आम औरत ग़ायब है? (Image credit google)

पलाश आम तौर पर फागुन चैत में खिलता है। तमन्ना है आपके हिस्से की धूप हमेशा खिली रहे।
जवाब देंहटाएंआदरणीय पुरुषोत्तम जी, शुभकामनाओं के लिए सादर आभार.
हटाएंलाह की लाल हरी लहटियों में लोलित लावण्य लास,
जवाब देंहटाएंपल पल पुलक पुलक अपलक फूले पलामू का पलाश !!!
वाह!विश्वमोहन जी आपने अनुप्रास अलंकार की शोभा से सजा दिया इस पोस्ट को. पलामू के जंगल हो, सारंडा के जंगल हों या सतपुडा के जंगल, पलाश के लाल लाल फूल धरती और जीवन को रंगीन कर जाते हैं.
हटाएंप्रतिक्रिया देने के लिये ह्रदयतल से आभार.
प्रिय अपर्णा -- प्रणय के रंग से सुसज्जित रचना थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह जाती है | बहुत अच्छा लिखा आपने | सस्नेह शुभकामना ------
हटाएंपलाश का मौसम अब आने को है
जवाब देंहटाएंजब खिलने लगे पलाश
संजो लेना
आंखों मे
सजा रखना हृदय तल मे
फिर सूरज कभी ना डूबने देना
चाहतों के पलाश बस
यूं ही खिला खिला रखना
हरे रहेगें अरमानों के जंगल
प्रेम के हरे रहने तक।
लाजवाब अपर्णा जी बहुत सुंदर भाव श्रृंगार मे विकलता का अप्रतिम भाव काव्य सौष्ठव भी बहुत सुंदर।
आपके जीवन मे पलाश सदाबहार बन खिलते रहें।
शुभ दिवस।
मेरा सूरज उगता है
जवाब देंहटाएंतुम्हारी आँखों में,
मांग लेती हूँ धूप थोड़ी सी तुमसे;
न जाने कब,
हमारे प्रेम का सूरज डूब जाए...
Wahhhhhh। क्या ख़ूब दिलकश तब्सिरा है। लाज़वाब
अमित जी, तहेदिल से शुक्रिया
हटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंaabhar
हटाएंमुट्ठी में बंद धुप रिस जाती है समय की तरह ... सूरज रोज़ उगाना होता है ताकि खिलता रहे पलाश ... हरा ही रहे जंगल ...
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण रचना ...
बहुत बहुत आभार
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" सशक्त महिला रचनाकार विशेषांक के लिए चुनी गई है एवं सोमवार २७ नवंबर २०१७ को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"
जवाब देंहटाएंआदरणीय ध्रुव जी, मेरी रचना को इतना मान देने के लिये हृदय से आभारी हूं.
हटाएंसादर
बड़ी सरल और सहज मनोकामना ।
जवाब देंहटाएंधूप का गुनगुना अहसास बना रहे साथ ।
लाजवाब
जवाब देंहटाएंसुंंदर भावपूर्ण रचना..
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंमेरा सूरज उगता है तुम्हारी आँखों में....
जवाब देंहटाएंवाह!!!!
बहुत लाजवाब रचना....