Friday, June 30, 2017

रेशा - रेशा


रेशा - रेशा 

एक लावा बहता है उसके भीतर
जब भी चाहती है रक्त के बाहर निकाल फेंके उसे
वह रोटियों की परतों के नीचे छुप जाता है.
जब भी चीखना चाहती है जोर से
उसका गुस्सा हंसी बन फूट पड़ता है मुरझाये हुए होठों के बीच,
जब कोई कहता है तुम्हे बहुतअच्छी तरह जानता हूँ,
उसकी मूर्खता पर बस  मुस्कुरा के रह जाती है वह,
क्या इतना आसान है उसे समझना?
रेशा - रेशा उघड़ने के बाद भी सही सलामत दिख सकती है औरत,
सदियों तक हज़ार दरवाज़ों में बंद होने के बावजूद;
आज़ाद उडान बन सकती है औरत.


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