Monday, July 31, 2017

रासायनिक विध्वंश की आशंका (Fears of chemical destruction)

घनघोर अंधेरी रात में
जब घुमड़ते हैं मेघ
दिल थर- थर काँप उठता है।
सात समंदर पार बैठे हमारे अपने लोगों के सिर पर
कंही बरस न रहे हों गोले - बारूद,
आतताइयों के बनाये मंसूबों से
उजाड़ न हो रही हों मासूम बच्चों की जिंदगियां।
जिस प्रकार बह रहा है गुजरात ,
झेल रहे है पूर्वोत्तर राज्य बाढ़ की विभीषिका ,
उस पराये से देश में;
रासायनिक विध्वंश की बाढ़ न आ गयी हो,
बह न गयी हो मानवता।
जब युद्धोन्माद सिर चढ़ कर बोलता है,
देश के नमक हराम शाशक भूल जाते हैं मानवीय व्यवहार,
सामने वाले को कमतर समझने की भूल करके;
अपने ही नागरिकों को देने लगते हैं मृत्युदंड।
बरसते हुए मेघ शांत नहीं कर पाते उन्माद की ज्वाला।

ऐसे में एक आम नागरिक कर ही क्या सकता है
सिवाय थर- थर कांपने के;
और बनाये रखने के उम्मीद,
सही सलामत लौट आयेंगे वे लोग;
जो गए तो थे रोजी- रोजगार के लिए ,
आज वंहा काल के गुलाम बन कर रह गए हैं।

3 comments:

  1. लाज़वाब रचना अपर्णा जी।

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    1. शुक्रिया ... श्वेता जी , ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रियाओं का तहे दिल से स्वागत है . आप से सुझाओं की उम्मीद करती हूँ .

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  2. बहुत सुन्‍दर भावों को शब्‍दों में समेट कर रोचक शैली में प्रस्‍तुत करने का आपका ये अंदाज बहुत अच्‍छा लगा,

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